
फकीरा सिंह चौहान स्नेही
भारतीय संस्कृति में क्या खूब कहा गया है- ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात जहां नारी की पूजा की जाती है, उसका सम्मान किया जाता है वहां देवताओं का वास होता है.
मैं यह बात बड़े गर्व के साथ कह सकता हूं पहाड़ की संस्कृति के अंदर बहुत सारे ऐसे उदाहरण है जहां वास्तव में पुरुष प्रधान देश होने के बाद भी नारी को प्रथम स्थान तथा सम्मान दिया जाता है. जौनसार बावर के अंदर जो भी संस्कृति है वह अद्भुत और अनुकरणीय है. और सबसे बड़ी बात यह कि वह अपने आप मे अन्य संस्कृति से विशिष्ट है. इसी विशिष्टता के कारण इस क्षेत्र की कला संस्कृति और सभ्यता दुनिया को अपनी और आकर्षित करती है.
जब भी हम जौनसार बावर की संस्कृति से परिचित होते हैं, हमें इंसानियत और मानवता की सर्वश्रेष्ठ झलक यहां पर देखने को भली-भांति मिल जाती है.
जौनसार बाबर मे जब भी परिवार के जेष्ठ पुत्र का वैवाहिक उत्सव होता है. उस विवाह उत्सव में ‘रहिणी जीमात’ (नारी भोज) को सबसे महत्वपूर्ण रस्म मानी जाती है. गरीब से लेकर अमीर व्यक्ति तक जो भी उस समाज का हिस्सा है वह इस परंपरा को निभाने के लिए अपनी अपनी हैसियत के अनुसार बाध्य है. चाहे वह पद सोपान ओहदे पर कितना भी बड़ा और कितना भी दूर क्यों ना हो, उसे जेष्ठ पुत्र के विवाह करने के लिए अपने गांव मे रहिणी जीमात (महिला भोज) कराने हेतु आना ही पड़ता है. अगर किसी ने *महिला प्रीति भोज* नहीं कराया तो वह वैवाहिक उत्सव अधूरा सा माना जाता है.

‘रहिणी जीमात’ मे गांव की तमाम वह महिलाएं जो व्याह करके उस गांव में लाई गई है, अपना संपूर्ण रूप सिंगार करके आभूषण तथा पारंपरिक परिधान घाघरा, झगा,तथा ढांटु पहन कर उस *रहिणी जीमात* (महिला भोज) में शामिल होती है. पौराणिक जमाने में महिलाओं को घर में ही आसन पर बैठा कर के भोजन कराया जाता था. लेकिन आधुनिक परिवेश के चलते इसमें भी काफी परिवर्तन और चकाचौंध आ गयी है. अब बाकायदा टेंट डीजे तथा कुर्सी और मेज पर बैठा करके महिलाओं को भोजन ग्रहण कराया जाता है. विवाह उत्सव में इस परंपरा को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है. क्योंकि यह उस परिवार के द्वारा जिसके घर पर शादी हो रही है, महिलाओं को दिया गया एक मर्यादित सम्मानजनक प्रीति भोज है.
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विवाह उत्सव में महिलाओं के इस सम्मान को बारातियों से भी ऊपर रखा जाता है. महिलाओं का पूरे रस्म रिवाज के साथ आंगन में ढोल नगाड़े बजा करके स्वागत किया जाता है. फिर आदर सहित उनको भोजन ग्रहण कराया जाता है. जब महिलाओं को भोजन कराया जाता है उस समय कोई भी पुरुष भोजन ग्रहण नहीं करता है, बल्कि एक शांत वातावरण के साथ पुरुषों के द्वारा महिलाओं को भोजन परोसा जाता है. जिस परिवार मे शादी का उत्सव होता है, वह परिवार एक निवेदक के रूप में हाथ जोड़कर भोजन संपन्न होने तक विनम्र भाव से महिलाओं के पास खड़ा रहता है, ताकि महिलाओं के खानपान और स्वागत में कोई कमी ना रह जाए.
ऐसी परंपराएं विश्व में शायद ही कहीं मिलेगी जो समाज मे नारी के वजूद वरीयता प्रतिष्ठा को सबसे पूजनीय तथा अग्रणी मानकर नारी के प्रति एक आदर और सम्मानजनक निष्ठा भाव रखकर नारी के सेवा सत्कार को उत्कृष्ट बना देता है. आज भी हमारे संस्कृति के अंदर ऐसी प्रतिष्ठित परंपराएं कायम और बरकरार है.
आजकल धनाढ्य तुलनात्मक हैसियत,शान शौकत तथा विशाल वैभव और भव्यता के कारण विवाह कराने वाले परिवार के द्वारा महिलाओं को मिष्ठान परिधान तथा चांदी के सिक्के भी भेंट करने का रिवाज प्रचलन मे आ गया है. जो दिखावा मात्र के अलावा इस उत्कर्ष परंपरा तथा संस्कृति की अनिवार्यता नहीं है. साथ ही आने वाले भविष्य मे समाज के लिए बहुत ही घातक भी है. असक्षम परिवार के लिए यह सब आवश्यक भी नहीं है. अनिवार्यता केवल नारी को ससम्मानित दिया जाने वाला मुख्य भोज है.
भोजन ग्रहण करने के बाद महिलाओं का अपना पारंपरिक नृत्य होता है. इतना मान सम्मान शायद ही किसी दूसरे परंपरा में महिलाओं को दिया जाता होगा जितना इस विवाह परंपरा संस्कृति में दिया जाता है. ऐसी परंपराएं विश्व में शायद ही कहीं मिलेगी जो समाज मे नारी के वजूद वरीयता प्रतिष्ठा को सबसे पूजनीय तथा अग्रणी मानकर नारी के प्रति एक आदर और सम्मानजनक निष्ठा भाव रखकर नारी के सेवा सत्कार को उत्कृष्ट बना देता है. आज भी हमारे संस्कृति के अंदर ऐसी प्रतिष्ठित परंपराएं कायम और बरकरार है.
(लेखक भारत सरकार रक्षा मंत्रालय के विभाग एएफएमएसडी लखनऊ में कार्यरत है. तथा उत्तराखंड के जाने-माने गायक कलाकार गीतकार तथा साहित्यकार है.)