भारत की जल संस्कृति-19
आधुनिक भूवैज्ञानिक विश्लेषण
- डॉ. मोहन चंद तिवारी
वराहमिहिर ने निर्जल प्रदेशों में मिट्टी और भूमिगत शिलाओं के लक्षणों के आधार पर भूमिगत जल खोजने की जो विधियां बताई हैं आधुनिक भूविज्ञान के धरातल पर उसका अध्ययन ‘एक्वीफर्’ (Aquifer) के अंतर्गत किया जाता है. वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ के समान ही आधुनिक भूविज्ञान भी यह मानता है कि भूमि के उदर में ऐसी बड़ी बड़ी शिलाएं या चट्टानें होती हैं जहां सुस्वादु जल के सरोवर बने होते हैं. आधुनिक भूविज्ञान में इसे ‘एक्वीफर’ (Aquifer) की संज्ञा दी गई है. लेकिन जब हम वर्त्तमान सन्दर्भ में भूमिगत जल या ‘अंडरग्राउंड वाटर’ की बात करते हैं तो भूवैज्ञानिक धरातल पर इस आधुनिक ‘एक्वीफर ‘(Aquifer) अथवा जलभृत,या ‘अंडरग्राउंड वाटर’ की विशेष पारिभाषिक जलवैज्ञानिक स्थिति को समझना भी आवश्यक हो जाता है.
वराहमिहिर
प्रायः माना जाता है कि कुएं,नौले,धारे,
तालाब सरोवर आदि जलस्रोत भूमिगत सतही जल की कमी के कारण लुप्त हो रहे हैं.परंतु इसका जलवैज्ञानिक कारण वहां के सूखते एक्वीफर्स होते हैं.इस सन्दर्भ में भूमिगत जल की भूवैज्ञानिक हलचल को जानना भी बहुत जरूरी है.वराहमिहिर
सभ्यता के आदिकाल से ही भूमिगत जल
मातृभाव से मानव मात्र की सभी प्रकार की आवश्यकताएं पूरी करता आया है.भूमिगत जल के बारे में लोगों को प्रायः कम ही जानकारी होती है. भूमिगत जल,या ‘ग्राउंड वाटर’ भू सतह के नीचे चट्टानों के छिद्रों एवं दरारों में संचित वह जल है, जिसे प्रायः ‘भौमजल’ भी कहते हैं. वर्षा एवं हिमजल ‘आकाशीय’ जल कहलाता है. यह आकाशीय जल भू सतह पर गिरने के बाद तीन भागों में विभक्त हो जाता है. एक भाग धरातल की प्रवणता के अनुसार ढालों पर बहता है. दूसरा भाग ढालों पर बहता हुआ नदियों,तालाबों, झीलों आदि में मिल जाता है,परंतु यह जल वाष्पीकरण के द्वारा सूखकर वायुमंडल में भी मिलता रहता है. तीसरा भाग भू सतह के नीचे विद्यमान पत्थर की चट्टानों के छिद्रों एवं दरारों में जमा हो जाता है. इस तीसरे भाग को ही आधुनिक भूविज्ञान में ‘भौमजल’, ‘एक्वीफर’ या ‘ग्राउंड वाटर’ कहते हैं.वराहमिहिर
दरअसल, ‘एक्विफ़र’ धरती के भीतर मौजूद उस संरचना को कहते हैं जिसमें मुलायम चट्टानों,छोटे-छोटे पत्थरों, चिकनी मिट्टी और गाद के भीतर भारी मात्रा में पानी जमा रहता है.
धरती के भीतर मौजूद यह पानी भले ही हमें खुली आँखों से दिखाई न दे,लेकिन धरती के भीतर चट्टानों और छोटे-बड़े गोल पत्थरों के बीच जमा यह लाखों गैलन पानी मानव जाति के लिये अनमोल संचित कोष है. सूखे एवं अकाल के समय यह संचित भूमिगत जल कोष ही मनुष्य का अंतिम सहारा होता है. मनुष्य द्वारा इसी संचित कोष से नलकूपों या हैंडपम्पों द्वारा समय समय पर बेरहमी से जल का दोहन किया जाता रहा है.अक्सर देखा गया है कि जब किसी गहरी झील या तालाब के पास कुँआ खोदा जाता है तब उसमें काफ़ी कम गहराई पर ही पानी प्राप्त हो जाता है,यह ‘एक्विफ़र’ की बदौलत ही होता है.
उस क्षेत्र विशेष में ‘एक्वीफर्स’ के कारण पानी का इतना घनत्वीकरण हो चुका होता है कि आसपास मौजूद चट्टानों के भीतर छोटे-छोटे कणों में पानी संचरणशील बना रहता है.वराहमिहिर
भूविज्ञान की दृष्टि से भूमिगत जल
की सबसे ऊपरी परत को “वाटर टेबल” (Water Table) या सतही जल कहते हैं.जबकि पानी से लबालब निचली सतह को ‘भौमजल’ ‘जलभृत’ या ‘एक्विफ़र’ कहते हैं. किन्तु भूमिगत संचित जल के भंडारगृहों के रूप में विद्यमान इन ‘एक्विफर्श’ में जब जल की कमी होने लगती है या वे लुप्त होने के कगार पर होते हैं तो जलविज्ञान की भाषा में उसे ‘ग्राउंड वाटर’ में गिरावट कहा जाता है. तब आस पास के नौले, धारे, तालाब,सरोवर यहां तक कि गाड़ गधेरे और नदियां भी सूखने लगती हैं क्योंकि वहां के पार्श्ववर्ती ‘एक्विफर्श’ में पानी का कोष समाप्त हो गया होता है.वराहमिहिर
आधुनिक भूविज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली
में भूमिगत चट्टानों में जल के प्रवेश करने या रिसने की क्षमता को ‘पारगम्यता’ कहते हैं.अतः जो चट्टानें अधिक पारगम्य होती हैं,उनमें आकाशीय वर्षाजल अधिक मात्रा में प्रवेश कर सकता है.उससे भौमजल की मात्रा भी बढ़ जाती है. इसी पारगम्यता के सिद्धांतानुसार चट्टानों को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है.- पारगम्य चट्टानें : जिन शैलों में अधिक मात्रा में जल प्रवेश करने की क्षमता होती है उन्हें पारगम्य चट्टानें कहते हैं. जैसे बालू, बजरी, बोल्डर्स, विदरित या जोड़ दरार युक्त चट्टानें,चूना-पत्थर आदि.
- अर्द्धपारगम्य चट्टानें: जिन शैलों में जल कुछ मात्रा में प्रवेश कर सकता है. उदाहरण सैंडीलोम, अपघटित पीट आदि.
- अपारगम्य चट्टानें: इस प्रकार के शैलों में जल बिलकुल ही प्रवेश नहीं कर सकता. जैसे अविदरित आग्नेय, शैल, कॉम्पेक्ट मेटामारफिक रॉक आदि.
वराहमिहिर
कायांतरित अथवा आग्नेय
चट्टानों की अपेक्षा अवसादी चट्टानें अधिक जलधारक होती हैं,जैसे कि बलुआ चट्टानें. कठोर चट्टानों में जल-संग्रहण कर सकने योग्य छिद्र ही नहीं होते. जिन भूमिगत चट्टानों में छिद्र अथवा दरारें होती हैं, उनमें यह पानी न केवल संग्रहित हो जाता है,अपितु एक छिद्र से दूसरे छिद्र होते हुए और ऊँचे से निचले स्थान की ओर प्रवाहित होते हुए अपनी हलचल भी बनाये रखता है.मृदा से चट्टानों तक पहुँचने की प्रक्रिया में पानी छिद्रों से छनता हुआ स्वयमेव स्वच्छ होता चला जाता है. किन्तु यही ‘भौमजल’ ‘जलभृत’ या ‘एक्विफ़र’ का संचित पानी यदि किसी कारण से प्रदूषित हो जाये तो फिर बहुत बड़े जल-संग्रहण को भी प्रदूषित कर देता है, क्योंकि ये भूमिगत जलसंग्रह जल नाड़ियों या शिराओं के माध्यम से आपस में जुड़े होते हैं.इस आधुनिक भूविज्ञानपरक
जलवैज्ञानिक मान्यताओं को हम बृहत्संहिता के 54वें अध्याय में वर्णित भूमिगत जलान्वेषण के सन्दर्भ में आसानी से समझ सकते हैं,जहां वराहमिहिर कहते हैं कि जल के स्वरूप अर्थात् उसके गुणवत्ता के लक्षणों की पहचान करनी है तो सबसे पहले भूमि की परीक्षा करनी चाहिए –“एकेन वर्णेन
नभस्तो वसुधाविशेषात्.
नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं
परीक्ष्य क्षितितुल्यमेव..”
– बृहत्संहिता,54.2
वराहमिहिर
वर्षाजल और सतही जल का
आपसी संबंध भी जानना आवश्यक है. नदियों में बहने वाला जल केवल वर्षाजल अथवा ग्लेशियर से पिघल कर बहता हुआ पानी ही नहीं हैं. नदी अपने जल में भूमिगत जल से भी योगदान लेती है,साथ ही भूमिगत जल को योगदान देती भी है. कुएं,नौले,बावड़ी,ताल, झील और बाँधों आदि के इर्द-गिर्द भूमिगत जल की सहज सुलभता का कारण यही है कि ये ठहरे हुए ‘एक्वीफर्स’ (जलस्रोत) धीरे धीरे रिसते हुए अपना पानी इन भूमिगत प्राकृतिक जल संग्रहालयों को देते रहतेे हैं. इस प्रकार पृथ्वी के ऊपर पाए जाने वाले जलस्रोत और भूमिगत चट्टानों के जलस्रोत एक दूसरे की सहायता पर निर्भर होते हैं. वर्षा का जल यदि संग्रहीत कर चट्टानों तक पहुँचाया जाए तो भूमिगत ‘एक्वीफर्स’ यानी जलाशयों को भरा जा सकता है. प्रकृति अपने सामान्य क्रम में यह कार्य करती रहती हैं.वराहमिहिर
किंतु आज भूमिगत ‘एक्वीफर्स’ द्वारा संचित जल की समस्या विकराल रूप ले चुकी है.ग्रामीण क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक पेयजल स्रोत ‘एक्वीफर्स’ पर ही आधारित होते हैं. 50 से 80 प्रतिशत तक सिंचाई संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति भी इसी स्रोत द्वारा की जाती है. शहरों में आबादी बढ़ने एवं औद्योगिक विकास के कारण
पीने एवं औद्योगिक उपयोग हेतु जल की मांग बहुत बढ़ी है.फलतः भूमिगत ‘एक्वीफर्स’ जलस्रोतों के बेरहमी से दोहन के कारण इसमें निरंतर रूप से जल की कमी होती जा रही है. इमारतों,सड़कों एवं अन्य पक्के निर्माण की बहुलता एवं अवरोध तथा विकास के लिए जंगल एवं पेड़ों को बेरहमी से काटने के कारण वर्षा के जल द्वारा ‘एक्वीफर्स’ के पुनर्भरण में बहुत कमी आई है तथा इसके कारण वर्षाजल का लगभग 90 प्रतिशत भाग बहाव के रूप में व्यर्थ ही बह जाता है.वराहमिहिर
इसलिए इस जल संकट के काल
में भूमिगत ‘एक्वीफर्स’ के पुनर्भरण को एक अभियान बनाकर कार्य करने की बहुत आवश्यकता है.इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य जल को जीवन मान कर बचाया जाना और सरल वैज्ञानिक विधियों द्वारा इसे भूमि के भीतर पहुँचाया जाना आवश्यक है.अपनी पुरानी पीढ़ी द्वारा संरक्षित इस संचित कोष ‘एक्वीफर्स’ से जो जल हमने जल शोषक कृत्रिम मशीनी उपकरणों से अपव्यय किया है,उसके पुनर्भरण का दायित्व भी आज की पीढ़ी का है.इसलिए आवश्यकता है कि जल संकट के इस दौर में समय रहते हम भूमिगत ‘एक्वीफर्स’ को उपभोक्ताभाव और व्यापारिक गतिविधियों से किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचाएं और जो नुकसान पहुंच चुका है,उसकी तुरन्त भरपाई करें, ताकि हमारी भावी पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित रह सके. इस जल संरक्षण अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार और जनता को एकजुट होना होगा.*सांकेतिक चित्र गूगल से साभार*
आगामी लेख में पढ़िए- “भारत में
भौमजल (एक्वीफर्स) की दशा और दिशा एक भूवैज्ञानिक विश्लेषण”(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)