- डॉ. राजेंद्र कुकसाल
मुख्यमंत्री की कृषकों के हित में सराहनीय एवं स्वागत योग्य पहल, राज्य में गतिमान 3900 जैविक कलस्टरों की हकीकत
उत्तराखंड कृषि प्रदान राज्य है जहां पर अधिकांश लोगों की आजीविका कृषि पर ही निर्भर है. राज्य का अधिकांश भाग पर्वतीय है जहां पर 65 प्रतिशत वन आच्छ्यादित हैं. पर्वतीय क्षेत्रों में बर्षा
आधारित कृषि होती है साथ ही इस क्षेत्र में रसायनिक खाद का उपयोग बहुत कम यानी 5 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर ही होता है. पहाड़ी क्षेत्रों में जैविक खेती की संभावनाओं को देखते हुए 2003 में शासन द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों में शत् प्रतिशत एवं मैदानी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत स्वैच्छा से जैविक खेती करने का निर्णय लिया गया.नेता जी
चर्ष 2003 में कृषि विभाग एवं उत्तरांचल
जैविक उत्पादन परिषद द्वारा गहन विचार विमर्श के बाद जैविक कृषि मार्ग निर्देशिका (रोड़ मैप) प्रकाशित की गई.जैविक कृषि मार्ग निर्देशिका के अनुसार
उत्तराखंड में जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड को एक कृषि आधारित, प्रदूषण विहीन, स्वास्थ्यवर्धक ओर स्वावलंबी राज्य के रूप में स्थापित करना है.नेता जी
पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों
(वनों में उपलब्ध जैविक अवशेष) का उपयोग करते हुए ग्राम स्तर पर जैविक खाद उत्पादन कर जहां एक ओर खेती पर लागत कम आयेगी साथ ही स्थानीय युवकों को रोजगार भी मिलेगा.नेता जी
मैदानी क्षेत्रों में भूमि की उर्वरा
शक्ति बढ़ाने हेतु हरी खाद के लिए विभागों द्वारा ढैचा बीज क्रय कर जैविक खेती करने वाले कृषकों को वितरित करने का था. जैविक खेती के बारे ग्रामीणों को प्रशिक्षण एवं जानकारी देने हेतु प्रत्येक विकासखण्ड में एक एक प्रशिक्षण प्राप्त स्थानीय पड़े लिखे युवाओं को मास्टर ट्रेनर के रूप में रखा गया.नेता जी
जैविक खेती में उपयोग होने
वाले वायो एजैन्टस (ट्राईकोडर्मा, वैवेरिया वेसियाना आदि) तैयार करने का जिम्मा गढ़वाल क्षेत्र हेतु पन्त नगर कृषि विश्वविद्यालय का कैम्पस रानीचौरी (टेहरी गढ़वाल) तथा कुमाऊं मंडल हेतु पन्त नगर कृषि विश्वविद्यालय को दिया गया.नेता जी
स्थानीय संस्थाओं द्वारा उत्पादन का
प्रमाणीकरण तथा इनका विपणन स्थानीय एवं वाह्य बाजारों में करना ताकि जैविक खेती राज्य में गरीबी उन्मूलन का एक प्रमुख साधन हो सके. राज्य में कुल दस हजार जैविक क्लस्टर विकसित कर जैविक खेती करने का निर्णय लिया गया.शुरू के वर्षों में जैविक कृषि मार्ग
निर्देशिका के अनुरूप कार्य भी हुये कुछ युवकों ने रोजगार हेतु वर्मी कम्पोस्ट व कम्पोस्ट खाद बनाना शुरू भी किया जिसकी दरें शासन स्तर से न्यायपंचायत स्तर के लिए भी तय की गई साथ ही विभागों को इसे राजकीय फार्मों में उपयोग करने के निर्देशित भी दिये गये थे.नेता जी
किन्तु बाद के वर्षों में विभागों की
उदासीनता के कारण स्थानीय युवकों ने जैविक खाद बनाने के कार्य बन्द कर दिए. विभागों ने उत्तराखंड में जैविक खेती के मायने ही बदल दिये. राज्य में जैविक खेती का उद्देश्य था स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए कृषि उपज को जैविक मोड़ में लाना तथा स्थानीय युवाओं को जैविक खेती के माध्यम से रोजगार से जोड़ना.नेता जी
वर्तमान में जैविक खेती के माने है
तराई व मैदानी क्षेत्रों (काशीपुर रुद्रपुर आदि) में स्थापित फर्मों से टैंडर से निम्न स्तर के जैविक बीज, जैविक दवा जैविक खाद खरीद कर आवंटित बजट को ख़र्च करना है.विभागों द्वारा क्रय इन जैविक दवा
खाद बीज का प्रयोग कोई भी प्रगतिशील कृषक नहीं करता. कुछ समय तक ये निवेश सरकारी स्टोरों में पढ़ें रहते हैं बाद में सड़कों के किनारे या गाढ़ गधेरों में पढे मिलते हैं.नेता जी
माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा वर्ष 2017 में राज्य में एक हजार पांच सौ करोड़ रुपये की परम्परागत कृषि विकास योजना स्वीकृत की गई, जिसका उद्देश्य राज्य के परम्परागत (स्थानीय/देशी)
बीजों का अनुरक्षण एवं संम्वर्धन करना एवं इन बीजों से प्राप्त उपज का जैविक प्रमाणीकरण करना तथा व्रान्डिंग कर मार्केटिंग करना है. इस कार्य हेतु प्रोत्साहन के लिए कृषकों की आर्थिक मदद करना है जिसका भुगतान डीबीटी के माध्यम से करने का है.नेता जी
प्रधानमंत्री जी का संकल्प है कि किसानों को योजनाओं में मिलने वाला अनुदान सीधे उनके खाते में जमा हो इसी निमित्त भारत सरकार के कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय ने अपने पत्रांक कृषि भवन, नई दिल्ली दिनांक फरवरी 28, 2017 के द्वारा कृषि विभाग की योजनाओं में कृषकों को मिलने वाला अनुदान डीबीटी के अन्तर्गत
सीधे कृषकों के खाते में डालने के निर्देश सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के कृषि उत्पादन आयुक्त, मुख्य सचिव, सचिव एवं निदेशक कृषि को किये गये. जिसके परिपालन में हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित सभी राज्यों ने वर्ष 2017 से ही कृषि योजनाओं में मिलने वाले अनुदान की धनराशि चयनित कृषकों के खाते में डीबीटी के माध्यम से डालना शुरू कर दिया है। किन्तु देवभूमि उत्तराखंड में ऐसा नहीं हो रहा.नेता जी
जैविक खेती को पारदर्शी एवं प्रभावी बनाने हेतु हिमाचल सरकार ने ज़ीरो बजट खेती वर्तमान में सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती करने का निर्णय लिया है तथा सुभाष पालेकर को
अपना जैविक खेती का ब्रांड एम्बेसडर बनाया है इस जैविक खेती में कोई लागत नहीं लगती. भारत सरकार से परम्परागत कृषि में आवंटित बजट से कृषकों के उत्पादन का जैविक प्रमाणीकरण एवं ब्रांडिंग हो रही है.वर्ष 2003 में शुरू हुई जैविक खेती की महत्वाकांक्षी योजना जिसका उद्देश्य राज्य के स्थानीय वेरोजगार युवाओं को रोजगार से जोड़ना तथा सीमांत एवं लघु सीमांत
गरीब कृषकों की आर्थिक स्थिति सुधारना था कृषि एवं उद्यान विभाग के संगठित भ्रष्टाचार (माफिया) के कारण दम तोड़ती नजर आ रही है. जब तक राज्य के कृषक संगठित होकर योजनाओं में पारदर्शिता की मांग नहीं करेंगे कृषकों के हित में बनी योजनाओं में ऐसी ही लूट चलती रहेगी.(लेखक कृषि एवं उद्यान विशेषज्ञ हैं)